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क्या होता है 'चिल्ले कलां'? 40 दिनों तक हाड़ कंपा देने वाली ठंड में कैसा दिखता है कश्मीर | आप भी देखिये जन्नत का नजारा

What is Chillai Kalan: 'चिल्ले कलां' के 40 दिनों तक हाड़ मांस तक जमा देने वाली ठंड पड़ती है और इसका दौर 31 जनवरी को समाप्त होता है. 'चिल्ले' का कश्मीरी भाषा में मतलब है 'चालिस' और 'कलां' का अर्थ है 'बड़ा'. मूलतः यह फारसी के शब्द हैं.

By Parinay Kumar | Updated: January 2, 2025 11:04 AM IST

'क्या होता है चिल्ले कलां'

What is Chillai Kalan: कश्मीर भीषण ठंड की चपेट में है, क्योंकि वहां 'चिल्ले कलां' की शुरुआत हो चुकी है. आइये जानते हैं कि 'चिल्ले कलां' आखिर होता क्या है और इस दौरान कश्मीर के लोगों का जीवन यापन कैसे चलता है? कश्मीर में हर साल 'चिल्ले कलां' के दिनों की शुरुआत 21 दिसंबर से होती है. इसके बाद वहां 40 दिनों तक हाड़ मांस तक जमा देने वाली ठंड पड़ती है और इसका दौर 31 जनवरी को समाप्त होता है. 'चिल्ले' का कश्मीरी भाषा में मतलब है 'चालिस' और 'कलां' का अर्थ है 'बड़ा'. मूलतः यह फारसी के शब्द हैं.

'चिल्ले कलां के बाद चिल्ले खुर्द'

40 दिनों की 'चिल्ले कलां' की अवधि खत्म होने के बाद जैसे ही सर्दी में थोड़ी कमी आती है तो 31 जनवरी से 19 फरवरी तक 20 दिनों के लिए 'चिल्ले-खुर्द' शुरू हो जाता है. 'चिल्ले-खुर्द' के 20 दिनों में 'चिल्ले-कलां' के मुकाबले ठंड से कुछ हद तक कमी मिलती है. 'खुर्द' का मतलब 'छोटा' है.

फिर 'चिल्ले बच्चा' का टाइम

बीस दिनों का समय गुजरने के बाद सर्दी की सबसे छोटी अवधि शुरू होती है जिसे 'चिल्ले-बच्चा' के नाम से जाना जाता है. सर्दी का यह दौर हर साल 19 फरवरी से आरंभ होकर दो मार्च तक चलता है और धीरे-धीरे सर्दी से राहत मिलने लगती है.

मुश्किल भरे होते हैं दिन

'चिल्ले कलां' की सर्दी वहां के लोगों के लिए हर लिहाज़ से बेहद मुश्किल भरे होते हैं. भयंकर सर्दी का चारों तरफ प्रकोप रहता है. आम जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित रहता है और ज़िंदगी एक तरह से ठहर सी जाती है.

हर ओर बर्फ की सफेद चादर

'चिल्ले कलां' दौरान जम्मू-कश्मीर के सभी पर्वतीय इलाकों में बर्फ की सफेद चादर बिछ जाती है और जबरदस्त सर्दी पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेती है. लगभग सभी छोटी-बड़ी झीलें व नदियां जमने लगती हैं. श्रीनगर की प्रसिद्ध डल झील पर तो लोग क्रिकेट तक खेलते नज़र आते हैं.

बर्फानी तूफान की हर समय आशंका

'चिल्ले कलां' के शुरुआती दिनों में हिमपात लगातार होता रहता है. अधिकांश समय बादल और कोहरा रहता है. अक्सर सख़्त व रूखी ठंडी हवाएं चलती हैं और तापमान ख़तरनाक स्तर तक नीचे चला जाता है. तेज़ बारिश के साथ बर्फानी तूफान व हिमस्खलन आदि की आशंका भी हर समय बनी रहती है.

हर कश्मीरी को रहता है इंतजार

'चिल्ले कलां' के कठिन दिनों का आम कश्मीरी को इंतज़ार रहता है. खतरनाक ठंड के इन दिनों से डरने या घबराने की जगह लोग एक-दूसरे को बकायदा मुबारकबाद देते हुए 'चिल्ले कलां' का स्वागत करते हैं.

सूखी सब्जियों का करते हैं भंडारण

सूखी सब्जियां इकट्ठा करते हैं लोग

सख़्त ठंड और हिमपात के कारण 'चिल्ले कलां' के दौरान ताज़ा सब्जियां और मांस आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता, ऐसे में सूखी सब्जियों और सूखे मांस का सेवन किया जाता है.

कई समस्याओं का करना पड़ता है सामना

खराब मौसम और बर्फबारी के कारण इन दिनों बिजली की कमी व कटौती भी बढ़ जाती है, जिस कारण इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मात्र शोभा का सामान ही बन कर रह जाते हैं. ऐसे में ठंड से बचने के लिए सदियों से चले आ रहे पुराने व आजमाए जा चुके पारंपरिक साधन ही कारगर साबित होते हैं.

पारंपरिक पोशाक बचाते हैं जान

इनमें 'कांगड़ी' और 'फिरन' की अपनी एक अलग पहचान है. बिना 'कांगड़ी' और 'फिरन' के 'चिल्ले कलां' तो दूर सामान्य ठंड के दिनों को भी गुजार पाना असंभव है. कश्मीर की पारंपरिक पोशाक 'फिरन' को पहनकर और 'हाथों में 'कांगड़ी' लेकर लोग अपने रोजमर्रा के जरूरी कामकाज निपटाते हुए नज़र आ जाते हैं.

बिजली-पानी का रहता है संकट

प्राकृर्तिक रूप से बेहद मुश्किल भरे इन दिनों में आम लोगों को बिजली-पानी की ज़बरदस्त कमी का सामना करना पड़ता है. सरकारों के तमाम दावों के बावजूद कई-कई दिनों तक बिजली-पानी जैसी सुविधा का नहीं मिल पाना कई तरह की परेशानियों का कारण बनता है.

ग्लेशियरों के निर्माण में सहायक

भूवैज्ञानिकों व पर्यावरणविदों का मानना है कि इन दिनों का हिमपात ग्लेशियर के बनने संवरने की प्रक्रिया में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इन दिनों का हिमपात ग्लेशियर की सेहत के लिए एक तरह से संजीवनी का काम करता है.

Photos Socurce: Manu Shrivatsa