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भारत पर विदेशी कर्ज तेजी से बढ़ रहा है. वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, 2010 से लेकर 2023 तक भारत पर विदेशी कर्ज दोगुना से भी ज्यादा हो चुका है. 2023 के अंत तक देश पर कुल 646.8 अरब डॉलर का कर्ज था, जबकि 2010 में यह आंकड़ा केवल 290.4 अरब डॉलर था.
भारत ने 2023 में विदेशी कर्ज पर 22.5 अरब डॉलर का ब्याज चुकाया, जो 2022 के मुकाबले करीब 50% अधिक था. 2022 में यह आंकड़ा 15.1 अरब डॉलर था. 2010 में भारत ने सिर्फ 4.6 अरब डॉलर का ब्याज चुकाया था. यह बढ़ोतरी बताती है कि कर्ज का बोझ कितना भारी हो गया है.
भारत के कुल विदेशी कर्ज का 77% हिस्सा लंबी अवधि के कर्ज का है, जबकि बाकी 23% कर्ज छोटी अवधि का है. इस कर्ज का एक तिहाई हिस्सा बहुपक्षीय संस्थानों जैसे वर्ल्ड बैंक से लिया गया है, जबकि सबसे बड़ा कर्ज जापान से लिया गया है, जो कुल कर्ज का 11% है.
भारत का विदेशी कर्ज भले ही बढ़ा हो, लेकिन अन्य देशों की स्थिति काफी चिंताजनक है. चीन पर विदेशी कर्ज 2.4 लाख करोड़ डॉलर से अधिक है, और उसने 2023 में 49.8 अरब डॉलर ब्याज के रूप में चुकाए. वहीं, ब्राजील और मैक्सिको जैसे देशों पर भी विदेशी कर्ज है, लेकिन वे भारत से ज्यादा ब्याज चुका रहे हैं. ब्राजील ने 2023 में 24.5 अरब डॉलर और मैक्सिको ने 23.1 अरब डॉलर ब्याज चुकाया, जबकि उनका कर्ज भारत से कम है.
भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी कर्ज को विकास के लिए एक साधन के रूप में देखा जा सकता है. हालांकि, लगातार बढ़ते कर्ज और ब्याज भुगतान के बोझ से वित्तीय दबाव बढ़ता है. इससे सरकार को भविष्य में कर्ज की चुकौती के लिए ज्यादा संसाधन जुटाने होंगे.
भारत को अपनी आर्थिक नीति में सतर्कता बरतने की जरूरत है. इसके लिए विदेशी कर्ज का संतुलित इस्तेमाल और घरेलू संसाधनों को मजबूत करना जरूरी होगा. इस बीच, विदेशी निवेश बढ़ाने और निर्यात को बढ़ावा देने के उपाय भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
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