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भारत में शहरी मिडिल क्लास की खपत में गिरावट ने अर्थव्यवस्था के लिए चिंता बढ़ा दी है. कंज्यूमर गुड्स कंपनियों के हालिया आंकड़े और ऑटो उद्योग की मंदी से यह साफ संकेत मिलता है कि अगर यह ट्रेंड जारी रहा, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ सकता है.
2025 की दूसरी तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि कंज्यूमर गुड्स सेक्टर की कंपनियों, जैसे नेस्ले और हिंदुस्तान यूनिलीवर, को पिछले साल की तुलना में बहुत कम रेवेन्यू मिला. ऑटो सेक्टर में भी निराशाजनक प्रदर्शन देखने को मिला, जहां मारुति सुजुकी के वाहन की बिक्री में 4% की गिरावट आई. इसकी मुख्य वजह शहरी मिडिल क्लास की खर्च करने की क्षमता में कमी है.
आय में धीमी वृद्धि और बढ़ती महंगाई ने लोगों को अपनी खपत घटाने पर मजबूर कर दिया है. वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, सैलरी वृद्धि में बड़ी गिरावट आई है—2023 में जहां 10.8% की बढ़ोतरी हुई थी, वहीं 2025 की दूसरी तिमाही में यह सिर्फ 0.8% रही. इस स्थिति में लोगों के पास ज्यादा पैसा नहीं बच रहा, जिससे वे जरूरी वस्त्रों और सेवाओं पर भी खर्च नहीं कर पा रहे.
भारत की आर्थिक वृद्धि में सबसे बड़ा योगदान प्राइवेट कंजम्पशन का होता है. अगर खपत कम हो जाती है, तो यह समग्र आर्थिक विकास को धीमा कर सकता है. यदि यह गिरावट जारी रहती है, तो आरबीआई के अनुमानित 7.2% विकास दर में भी बदलाव हो सकता है. फिलहाल, निजी निवेश और निर्यात भी मंदे का सामना कर रहे हैं, जिससे देश के विकास के इंजन में कमी आ रही है.
सरकार ने इस समस्या को पहचानते हुए कुछ कदम उठाए हैं. केंद्रीय बजट में मिडिल क्लास के लिए टैक्स में राहत दी गई है, और कई राज्य सरकारें कैश ट्रांसफर की योजना पर काम कर रही हैं. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक नौकरी के अवसर नहीं बढ़ते और सैलरी में सुधार नहीं होता, तब तक खपत में तेजी नहीं आ सकती.
अगर सरकार और कंपनियां मिलकर सही कदम उठाती हैं, तो मांग में सुधार हो सकता है, लेकिन इसके लिए लोगों का आत्मविश्वास और खर्च करने की क्षमता बढ़ानी होगी. वर्तमान में आर्थिक विकास का प्रमुख इंजन सरकारी खर्च और उपभोक्ता खपत है, और अगर दोनों में सुधार होता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था एक बार फिर गति पकड़ सकती है.
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