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इससे पहले कि ‘चिल्ले कलां’ के बारे में बात की जाए आपको बताते हैं कि कैसे कुछ दिन पहले कश्मीर घाटी के सोनमर्ग-गुलमर्ग जैसे खूबसूरत पर्यटक केंद्रों में हज़ारों पर्यटक खराब मौसम की वजह से फंस गए थे. कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में हुई भारी बर्फबारी में फंसे इन पर्यटकों के बहुत से वीडियो वायरल हो रहे हैं. इन वीडियो को देखकर दो बातें पता चल रही हैं. एक तो यह कि इन दिनों कश्मीर का मौसम कितना खतरनाक रूप ले लेता है और दूसरा यह कि कैसे खराब मौसम के कारण संकट में फंसे पर्यटकों के लिए कश्मीर के लोगों ने अपनी पारंपरिक मेहमाननवाज़ी का परिचय देते हुए एक बार फिर अपने घरों के दरवाज़े खोल दिए. उन्होंने पर्यटकों की दिल खोलकर मदद की और पर्यटकों को अपने घरों में ठहराने के अलावा उनके लिए खाने-पीने की व्यवस्था भी की. ऐसे कई वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें देखा जा सकता है कि कई जगह स्थानीय लोगों ने देश भर से आए पर्यटकों को मस्जिदों में ठहराया.
ऐसा पहली बार नही हुआ है जब स्थानीय लोगों ने पर्यटकों की इस तरह से मदद की हो. अक्सर इन दिनों ऐसे दृश्य जम्मू-कश्मीर में आम दिख जाते हैं. खराब मौसम व भारी हिमपात के कारण संचार सुविधाओं का ठप्प हो जाना और सड़कों का बंद हो जाना आम बात है. प्रशासनिक तंत्र भी पूरी तरह से बैठ जाता है और एक तरह से कुदरत के आगे बेबस दिखाई देता है. ऐसे हालात में आम लोग ही एक दूसरे की मदद करते दिखाई देते हैं.
वायरल वीडियो गत 27 और 28 दिसंबर की रात के हैं जब अचानक मौसम का मिज़ाज बिगड़ गया और भारी बर्फबारी होने लगी. देश भर से पर्यटक बर्फबारी देखने बड़ी संख्या में कश्मीर पहुंचे हुए थे. लेकिन इन पर्यटकों को शायद इस बात की जानकारी कम थी कि कश्मीर घाटी आने का जो समय उन्होंने चुना है वह सबसे भयंकर सर्दी का समय रहता है जिसे ‘चिल्ले कलां’ के नाम से जाना जाता है. ‘चिल्ले कलां’ के दौरान कब कहां अचानक मौसम खतरनाक ढंग से बिगड़ जाए कुछ कहा नहीं जा सकता. ऐसा ही गत 27 और 28 दिसंबर की रात को हुआ. मौसम 27 दिसंबर की शाम को अचानक खराब होना शुरू हुआ और पूरी रात बर्फबारी होती रही, जो जहां था वहीं फंस कर रह गया. इनमें बच्चे व बुजुर्ग भी शामिल थे. लगभग तमाम पहाड़ी रास्ते बर्फबारी और भूस्खलन से बंद हो गए, लेकिन स्थानीय लोगों की मदद से पर्यटक सुरक्षित अपने गंतव्यों तक पहुंच सकने में कामयाब हो सके. यह सबकुछ उस समय हुआ जब कश्मीर में ‘चिल्ले कलां’ की शुरुआत हो चुकी है और खून तक जमा देने वाली सर्दी का प्रकोप है.

हर साल ‘चिल्ले कलां’ के दिनों की शुरुआत 21 दिसंबर से होती है और 40 दिनों तक हाड़ मांस तक जमा देने वाली ठंड से सभी को कंपा देने के बाद यह दौर 31 जनवरी को समाप्त होता है. ‘चिल्ले’ का कश्मीरी भाषा में मतलब है ‘चालिस’ और ‘कलां’ का अर्थ है ‘बड़ा’. मूलतः यह फारसी के शब्द हैं. 40 दिनों की ‘चिल्ले कलां’ की अवधि समाप्त होने के बाद जैसे ही कड़क सर्दी में थोड़ी कमी आती है तो 31 जनवरी से 19 फरवरी तक 20 दिनों के लिए ‘चिल्ले-खुर्द’ शुरू हो जाता है. ‘चिल्ले-खुर्द’ के इन 20 दिनों में ‘चिल्ले-कलां’ के मुकाबले ठंड से कुछ हद तक कमी मिलती है. ‘खुर्द’ का मतलब ‘छोटा’ है.
बीस दिनों का समय गुज़रने के बाद सर्दी की सबसे छोटी अवधि शुरू होती है जिसे ‘चिल्ले-बच्चा’ के नाम से जाना जाता है. सर्दी का यह दौर हर साल 19 फरवरी से आरंभ होकर दो मार्च तक चलता है और धीरे-धीरे सर्दी से राहत मिलने लगती है. लेकिन जो 40 दिन ‘चिल्ले कलां’ की सर्दी के गुज़रते हैं वह हर लिहाज़ से बेहद मुश्किल भरे होते हैं. भयंकर सर्दी का चारों तरफ़ प्रकोप रहता है.

इन दिनों के दौरान आम जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित रहता है और ज़िंदगी एक तरह से ठहर सी जाती है. इस दौरान जम्मू-कश्मीर के सभी पर्वतीय इलाकों में बर्फ की सफेद चादर बिछ जाती है और जबरदस्त सर्दी पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेती है. लगभग सभी छोटी-बड़ी झीलें व नदियां जमने लगती हैं. श्रीनगर की प्रसिद्ध डल झील भी इन दिनों जम जाती और हर साल लोग इस झील के जमने पर क्रिकेट तक खेलते नज़र आते है.
‘चिल्ले कलां’ के शुरुआती दिनों में हिमपात लगातार होता रहता है. अधिकांश समय बादल और कोहरा रहता है. अक्सर सख़्त व रूखी ठंडी हवाएं चलती हैं और तापमान ख़तरनाक स्तर तक नीचे चला जाता है. तेज़ बारिश के साथ बर्फानी तूफान व हिमस्खलन आदि की आशंका भी हर समय बनी रहती है. दूरदराज़ के कई क्षेत्रों का सड़क संपर्क टूट जाता है. इस दौरान मौसम बेहद शुष्क बना रहता है. सूर्य के दर्शन न होने के कारण लोग कई-कई दिनों तक गुनगुनी धूप को तरसते रहते हैं. बर्फ और खराब मौसम की वजह से आम लोग घरों में एक तरह से बंद हो जाते हैं.
दिलचस्प तथ्य यह है कि ‘चिल्ले कलां’ के कठिन दिनों का आम कश्मीरी को इंतज़ार रहता है. खतरनाक ठंड के इन दिनों से डरने या घबराने की जगह लोग एक-दूसरे को बकायदा मुबारकबाद देते हुए ‘चिल्ले कलां’ का स्वागत करते हैं. कश्मीरी भाषा और संस्कृति में ‘चिल्ले-कलां’ का विशेष स्थान रहा है. कुछ लोकगीतों में बकायदा ‘चिल्ले कलां’ का प्रमुखता से उल्लेख भी मिलता है.

‘चिल्ले-कलां’ के बेहद मुश्किल भरे दिनों को देखते हुए स्थानीय लोग समय से पहले तमाम तरह की आवश्यक तैयारियां कर लेते हैं. हर ज़रूरी चीज का भंडारण कर लिया जाता है. लगभग हर घर में सूखी सब्ज़ियों, सूखे मांस, डिब्बाबंद दूध, सूखे मेवों, दवाईयों आदि का भंडारण करना एक आवश्यकता है ताकि ‘चिल्ले-कलां’ के कठिन दिनों में खाने-पाने की किसी प्रकार की समस्या न आने पाए. सख़्त ठंड और हिमपात के कारण ‘चिल्ले कलां’ के दौरान ताज़ा सब्जियां और मांस आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाता, ऐसे में सूखी सब्जियों और सूखे मांस का सेवन किया जाता है. हालांकि सुविधाओं में बढ़ोतरी होने की वजह से अब शहरी इलाकों में खाने-पीने की जरूरी चीजों की कमी कुछ हद तक नहीं होती. बावजूद इसके कोई जोखिम नहीं लिया जाता और आज भी हर घर में आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था समय से कर ली जाती है.
इन दिनों की भयंकर सर्दी के प्रकोप से बचने के लिए कुछ सुविधा संपन्न और साधनवान लोग जम्मू या देश के अपेक्षाकृत कम ठंडे इलाकों की ओर भी चले जाते हैं, लेकिन ऐसे लोगों की तादाद बहुत कम है. अधिकतर लोगों के लिए ऐसा कर पाना संभव नही है और उन्हें सर्दी के इन कठिन दिनों का सामना हर हाल में हर साल करना ही पड़ता है.
इसमें कोई संदेह नही कि समय बहुत बदल गया है और आधुनिक सुविधाओं ने हर घर में अपनी जगह बना ली है. लगभग हर किसी के पास आज इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों सहित तमाम सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन कश्मीर की सर्दी और ‘चिल्ले कलां’ के दिनों में आज भी लगभग हर व्यक्ति के लिए पारंपरिक साधन ही मददगार साबित होते हैं. खराब मौसम और बर्फबारी के कारण इन दिनों बिजली की कमी व कटौती भी बढ़ जाती है, जिस कारण इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मात्र शोभा का सामान ही बन कर रह जाते हैं. ऐसे में ठंड से बचने के लिए सदियों से चले आ रहे पुराने व आजमाए जा चुके पारंपरिक साधन ही कारगर साबित होते हैं.
इनमें ‘कांगड़ी’ और ‘फिरन’ की अपनी एक अलग पहचान है. बिना ‘कांगड़ी’ और ‘फिरन’ के ‘चिल्ले कलां’ तो दूर सामान्य ठंड के दिनों को भी गुजार पाना असंभव है. कश्मीर की पारंपरिक पोशाक ‘फिरन’ को पहनकर और ‘हाथों में ‘कांगड़ी’ लेकर लोग अपने रोजमर्रा के जरूरी कामकाज निपटाते हुए नज़र आ जाते हैं. समाज के हर वर्ग में ‘फिरन’ और ‘कांगड़ी’ समान रूप से प्रचलित व लोकप्रिय हैं. ‘फिरन’ और ‘कांगड़ी’ जैसे पारंपरिक साधन समाज में एक समान समानता और एकरूपता के खूबसूरत प्रतीक हैं. गरीब हो या अमीर हर किसी को ठंड में राहत देने में ‘फिरन’ और ‘कांगड़ी’ सक्षम हैं.
इसके अलावा घरों को गर्म रखने के लिए ‘हमाम’ व ‘बुखारी’ की मदद भी ली जाती है. लेकिन महंगे साधन होने की वजह से सुविधा संपन्न लोग ही ‘हमाम’ और ‘बुखारी’ जैसे साधनों का लाभ उठा पाते हैं. ‘हमाम’ लगभग पूरे घर को लंबे समय तक गर्म रखने में सहायक होता है, मगर इसका रख-रखाव बहुत ही मुश्किल और मंहगा है. जबकि ‘बुखारी’ का इस्तेमाल सीमित क्षेत्र में ही किया जा सकता है. घर के जिस कमरे में ‘बुखारी’ को स्थापित किया गया होता है वह सिर्फ उसी कमरे को गर्माहट दे पाने की क्षमता रखती है.

प्राकृर्तिक रूप से बेहद मुश्किल भरे इन दिनों में आम लोगों को बिजली-पानी की ज़बरदस्त कमी का सामना करना पड़ता है. सरकारों के तमाम दावों के बावजूद कई-कई दिनों तक बिजली-पानी जैसी सुविधा का नहीं मिल पाना कई तरह की परेशानियों का कारण बनता है. एक तरफ कड़क ठंड और दूसरी ओर भारी बर्फबारी के कारण बिजली-पानी के ढाचें को हर साल काफी नुक्सान भी पहुंचता है. इसकी वजह से बिजली व पीने के पानी का संकट लगातार बना रहता है. इन दिनों के दौरान बिजली कटौती की समस्या भयावह रूप ले लेती है. बिजली की कटौती की वजह से भी लोगों को पारंपरिक साधनों पर ही निर्भर होना पड़ता है.
भूवैज्ञानिकों व पर्यावरणविदों का मानना है कि इन दिनों का हिमपात ग्लेशियर के बनने संवरने की प्रक्रिया में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इन दिनों का हिमपात ग्लेशियर की सेहत के लिए एक तरह से संजीवनी का काम करता है और पिघल रहे ग्लेशियरों के आसपास एक ठोस दीवार सी बना देता है, जिससे ग्लेशियरों का पिघलना थम जाता है. अत्याधिक हिमपात होने की सूरत में कई बार नए ग्लेशियरों के निर्माण में भी इन दिनों की बर्फबारी की मदद मिलती है. इन दिनों की बर्फबारी से जमीन को कई तरह से जबरदस्त फ़ायदा पहुंचता है और उसकी उर्वरता की गुणा बढ़ती है. इन दिनों होने वाली बर्फबारी की उम्र लंबी होती है और बर्फ लंबे समय तक जमी रहती है, जिससे गर्मियों में जलस्रोतों में पानी की कमी नही रहती और गर्मियों में जलस्रोत सूखते नही हैं.
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